कहावतें |

अधजल गगरी छलकत जाए |

सावन के अंधे को सब हरा ही हरा दिखायी देता है|

ओखली में सर दिया तो मूसलों से क्या डरना?

सर सलामत तो पगड़ी हज़ार |

सौ सुनार की एक लौहार की |

जल में रहकर मगर से बैर ठीक नहीं|

घर का भेदी लंका ढाए|

ऊँट के मुँह में जीरा|

चोर की दाढी में तिनका |

अंधों में काना राजा |

जिसकी लाठी, उसकी भैंस |

अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया

चुग गई खेत |

आगे कुँवा, पीछे खाई |

ऊँची दूकान फ़ीके पक्वान|

आप भला तो जग भला |

मूल:संग्रह |

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