संस्कृत सौरभ |

१)दैवाधीनम जगत्सर्वम |
२)संतोषम  जनयेत  प्राज्नः |
तदेव ईश्वर पूजनम |
(दूसरों को खुश रखना भगवान
की पूजा के समान है |)
३)वाग्भूषणम  भाषणम |
४)वचन मूलमिदम जगत |
५)गुणाः पूजा स्थानम |
(व्यक्ति के अच्छे गुणोंको
मानना चाहिए |)
गुणिषु न च लिंगम | न च वयः |
(उसकी उम्र या जाति-स्त्री या पुरुष –
को महत्त्व  देना  नहीं चाहिए |)
६)उत्सव प्रिया हि मनुष्यः |
७)असारम खलु संसारम |
सारम श्वशुरालायम |
(निस्सार संसार या जगत में सार
सिर्फ पत्नी के पिता के घर में है |
अर्थात  र्श्री हरि लक्ष्मी के साथ क्षीर
समुद्र /ससुराल/  में रहना पसंद
करता है |)
८)गंडस्योपरि पिटक संवृतः |
(चोट पर चोट लगना )
९)ते हि नो दिवस गताः |
(बीते दिनों को याद करने से
क्या लाभ ?)
१०)श्रेयाम्सी बहु विघ्नानि |
(अच्छे कामों को अड़चन  या विरोध
बहुत हैं )
मूल:संग्रह.
Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s