संस्कृत सुभाषितें |

१)शय्यां हि नाट्यस्य वदन्ति गीतं |
(नृत्य का बिस्तर संगीत है–भारत मुनि )
२)कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरं |
आरूह्य कविता शाखां वन्दे वाल्मीकि कोकिलं |
(कविता नामक पेड़ की शाखाओं में बैठ कर
वाल्मीकि नामक कोयल मधुर  राम नाम
का कूजन कर रही है )
३)अलंकार प्रियो विष्णु |
अभिषेक प्रिय शिवः |
४)अर्थम् अनर्थस्य मूलं |
(सम्पत्ती सब विपत्ती का हेतु है )
५)नास्ति विद्या समं चक्षु |
नास्ति सत्य समं तपः |
नास्ति राग समं दुःख |
नास्ति त्याग समं सुखं |
(विद्या से बढ़  कर कोई आँख नहीं है |
सत्य से बढ़ कर कोई तपस्या नहीं है |
भोग से बढ़ कर कोई दुःख नहीं है |
त्याग से बढ़ कर कोई सुख नहीं है |)
६)भय कृदभय नाशनः (भगवान् डराता
भी है और डर को दूर भी कर सकता है |)
७)प्राप्तेतु शोड़षे वर्षे  पुत्रे मित्र वदाचारेत |
(सोलह साल के बाद पुत्र के साथ दोस्त
के समान बर्ताव करना चाहिए )
८)अनन्य भाजं पति माप्नुहि |
(दूसरी स्त्री को जो नहीं चाहता है,
ऐसा पति तुम्हे मिले )
९)साक्षरा विपरीताश्चेत राक्षसा एव केवलं |
(साक्षारा शब्द को उलटा पढ़ें, तो राक्षसा
दिखाई देता है, अर्थात जो शिक्षित है ,
वह अगर गलत रास्ते पर चलने लगता है
तो राक्षस बन जाता है )
१०)रंजयति इति रागः |(जो मन को
प्रसन्न कर सकता है  वही राग है )
११)पुस्तकस्था च या विद्या |
पर हस्त गतं धनं | कार्य काले
समायते न सा विद्या न तद्धनं |
(किताब की विद्या और दूसरोंकी
संपत्ति ज़रूरत पड़ने पर काम नहीं
आएँगी )
मूल:संग्रह.
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